ek maa ki kahani jise sunkar aa jaye ankho me paani

एक मजबूर माँ की कहानी जिसे पढकर आपकी आँखे नम हो जायेंगी।

दोस्तो आज मैं आपको एक ऐसी ही माँ की दु:ख भरी कहानी सुनाता हूँ
दोस्तों मैं ये कहानी शुरू करने से पहले आपको बताना चाहूँगा कि जब कोई औरत माँ बन जाती है तो फिर उसके सुख और शौक नही रहते क्योंकि वो अपनी औलाद के सुख चैन को अपना बना लेती है हाँलकि उससे ऐसा करने के लिए कोई कहता नही है और न ही ये उसकी कोई मजबूरी होती है ये तो सिर्फ उसकी ममता है जो अपनी सन्तान के लिए नि:स्वार्थ होती है जिसका मोल कोई औलाद कभी नही चुका पाती है तो आओ दोस्तो आज मैं आपको एक ऐसी ही माँ की दु:ख भरी कहानी सुनाता हूँ। जिसे सुनकर शायद आपकी आँखें भी नम हो जाये|
note - इस कहानी के सभी पात्र व घटनाएँ कल्पनिक है
कहानी के पात्र – माँ साधन, पति मोहन , उसका बेटा सुरेश, सुरेश की पत्नी कामनी और कामनी
दोस्तो ये बहुत ही खुशहाल परिवार था इस परिवार में माँ, 3 साल का उसका बेटा और उसके पिता ये तीनो प्राणी सुख से अपनी जिन्दगी को जी रहे थे लेकिन शायद भगवान को ये मंजूर नही था और उनके इस हँसते खेलते परिवार को किसी की नजर लग गयी वो हुआ जिसका साधना को शायद अन्दाजा भी नही था एक हादसे में मोहन की मौत हो गयी मोहन साधना और उसके बेटे सुरेश को छोडकर इस दुनिया से जा चुका था अब बापस नही आने वाला था लेकिन साधना ने हिम्मत नही हारी वांकी जिन्दगी अपने बेटे सुरेश के साहारे जिने का फैसला कर लिया और धीर-2 अपने पति की यादों को भुलाकर अपनी  जिन्दगी की शुरूआत की साधना सुरेश को पढा लिखाकर एक बडा अफसर बनाना चाहती थी इस लिए उसने सुरेश का एड्मिशन(admission) एक अच्छे से स्कूल में करा दिया।
साधना के पति मोहन ने जो धन इकठ्ठा किया था वो अब धीरे -2 समाप्त हो गया था अब साधना को जरूरत थी काम की जिससे उसे अपने परिवार के लिए कुछ पैसे मिल सके लेकिन वो अधिक पढी लिखी तो थी नही वह केवल 8वीं तक पढी थी इसलिए विचारी काम भी क्या करती कुछ अमीर घरानो में जाकर लोगो के घरों की साफ-सफाई, बर्तन, पोंछा आदि करने लगी इस काम से उसको शाम का बचा – कुचा खाना पहनने के लिए पुराने कपडे और कुछ पैसे मिल जाते थे तो इस तरह से महीने मे उसे इतने पैसे मिल जाते थे कि वो अपने बेटे सुरेश का खर्चा निकाल के कुछ पैसे भी अपने लिए बचा लेती थी और अब साधना अपने बेटे के ख्यालो के साहारे अपनी आगे की जिन्दगी जिने लगती है
सुरेश भी अपनी माँ की उम्मीदों पर खरा उतरता है क्योंकि वो पढने लिखने में काफी होशियार था सुरेश हमेशा अपनी कक्षा में अवल आता था वह अपनी माँ से बहुत अधिक प्रेम करता था और अपनी माँ का आज्ञाकारी पुत्र था जो कि अपनी माँ की हर बात मानता था और उसे भी बुरा लगता था कि उसकी माँ दूसरों के यहाँ काम करती इसलिए जैसे ही उसने अपनी पढाई खत्म की तुरंत ही एक नौकरी के लिए आवेदन कर दिया ये एक सरकारी दफ्तर की नौकरी थी भगवान और किस्मत दोनो सुरेश के साथ थे सरकार ने सुरेश को इस नौकरी के लिए नियुक्त कर लिया और वुलवा पत्र जारी कर दिया
इधर सुरेश ने जब खबर सुनी तो खुशी के मारे पागल सा हो गया और भगता हुआ अपनी माँ के पास जाता है और उसके गले से लग जाता है म्माँ..माँ कहकर
माँ – क्या हुआ बेटा
सुरेश – माँ तुम सुनोगी तो तुम भी पागल हो जाओगी
माँ – पर हुआ क्या ये तो बताओ
सुरेश – माँ एक अच्छी – सी...
माँ – अच्छी  सी क्या
सुरेश – नौकरी मिल गयी है
माँ – सच मुच आज भगवान ने मेरी सुन ही ली है
यह पहला खुशी का मौका था साधना के पति की मौत के बाद जिसकी बजह से उसकी आँखो से आँसू छलक आये थे
सुरेश – माँ तू रो क्यो रही है क्या तू खुश नही है
माँ – बेटा ये मेरी खुशी के आँसू है आज मेरी खुशी का तो कोई ठीकाना ही नही है आज तो तुमने मेरे सारे सपने साकार कर दिए
सुरेश – माँ अब आपके रोने के दिन गये आपने बहुत दु:ख उठायें है अब आपको चिंता करने की कोई जरूरत नही है
तभी साधना अपने बेटे सुरेश को गले से लगा लेती है
कुछ दिनो बाद डाकिया एक चिठ्ठी लेकर आता है ये सुरेश का सरकारी वुलावा पत्र (call latter) था सुरेश को दो दिनो में इस नौकरी को join करना था इस लिए सुरेश ने अपने जाने की तैयारी शुरू कर दी थी माँ उदास थी और अब वो वक्त भी आ गया जब सुरेश को अपने घर से नौकरी के लिए जाना था
सुरेश – अच्छा, माँ तो अब मैं जाऊ
माँ – रोते हुए हाँ, बेटा और अपने गले से लगा लेती है
सुरेश – माँ तुम रोओगी तो मैं कैसे जाऊँगा please माँ रोओ मत
माँ – तेरे सिवा कौन है मेरा जिसके लिए मैं रोऊँगी बेटा तेरे जाने के बाद ये घर मुझे खाली - सा लगेगा
सुरेश – माँ तू चिंता ना कर मैं जाते ही रहने का इंतजाम करूँगा और अपनी माँ को अपने साथ ही शहर लेकर जाऊँगा
माँ – हाहाँ पता है मेरा बेटा अपनी माँ से बहुत प्यार करता है लेकिन वहाँ तू अपना ख्याल रखना
सुरेश – अच्छा ठीक है मेरी प्यारी माँ मुझे जाने की इज्जाजत दो फिर सुरेश अपनी माँ से गले मिलता है और उसके पैर छुकर उसका आर्शीबाद लेता है माँ उसे दरवाजे तक विदा करने आती है
माँ – सुन
सुरेश – हाँ,
माँ – जाते ही मुझे चिठ्ठी लिखना ना भूलना
सुरेश – अच्छा माँ ठीक है
अब सुरेश शहर के लिए अपने गाँव की स्टेशन पर रेलगाडी का इंतजार करता है और जैसे ही उसकी train आती है वह शहर के लिए रवाना हो जाता है और शहर पहुँचते ही अपनी जिम्मेदारी सम्भाल लेता है 5 – 6 दिन तो उसे अपने दफ्तर के काम को सझने में ही गुजर जाते है
फिर जब थोडी राहत मिलती है तो वो अपनी माँ साधना को एक चिठ्ठी लिखता है 3 दिन बाद पोस्टमैन सुरेश की चिठ्ठी लेकर माँ के पास आता है
पोस्टमैन – माता जी शहर से चिठ्ठी है आपके लिए
साधना – आती हूँ और भागती हुई आती है लाओ कहाँ है मेरे बेटे की होगी
पोस्टमैन – ये लो माँ जी, और चला जाता है
साधना खुशी से फूले नही शमा रही थी और तुरंत खोल के पढने लगती है
चिठ्ठी :---
माँ,
    पाँव लागूँ आप कैसी हो आप ठीक होगी इसी उम्मीद के साथ मैं आपको बताना चाहूगा कि मुझे                                              यहाँ आने में कोई परेशानी नही हुई और मेरे office के सभी लोगो का व्यावहार बहुत ही अच्छा है और पता है माँ शुरू 2 में मुझे यहाँ विल्कुल अच्छा नही लगा था क्योंकि मुझे आपकी बहुत याद आ रही थी मैं ये भी जानता हूँ कि तुम्हे भी हमारी बहुत याद आती होगी लेकिन माँ तुम चिंता ना करो जैसे ही मुझे office से छुट्टी मिलेगी मैं तुरंत तुम्हे लेने आ जाऊँगा तब तक रहने के लिए एक अच्छे से घर का इंतजाम भी कर लेगें! माँ तुम अपना ख्याल रखना
                         आपका प्रिय सुरेश
ये चिठ्ठी पढते – 2 माँ की आँखे आँसूओ से भर चुकी थी जिन्हे पोंछने के बाद माँ ने चिठ्ठी सम्भालकर रख दी और फिर अपने काम में लग गयी
फिर ठीक एक महीने बाद फिर से पोस्टमैन आया
पोस्टमैन – अरे माता जी
माँ - और इस बार माँ ने जरा भी देर नही की थी
पोस्टमैन – माँ जी इस बार आपका मनी ऑर्डर भी (money order) आया है इसलिए आपको हस्ताक्षर भी करने होंगे
माँ – उससे से क्या होगा ? वो क्या चिठ्ठी से बडा होता है ?
पोस्टमैन – नही माँ जी उसमे आपके बेटे ने आपके लिए पैसे भेजे है
माँ – अच्छा लाओ कहाँ करने है हस्ताक्षर
पोस्टमैन – जी आप यहाँ कीजिए और पोस्टमैन चला जाता है
और फिर माँ पैसों वाला लिफाफा बाद मे खोलती है पहले सुरेश की चिठ्ठी खोली
चिठ्ठी ;----
    माँ,
          अब तुम दूसरों के यहाँ काम करने मत जाना मैंने तुम्हारे लिए 10000/रू. भेजे है और मैं आपकी दुआ और आर्शीवाद से विल्कुल ठीक-ठाक हूँ आशा करता हूँ आप भी ठीक ही होगी
                                             आपका लाडला बेटा सुरेश
इसी तरह दो महीने तक सुरेश की चिठ्ठियाँ और पैसे आते रहे लेकिन सुरेश नही आया और माँ को पैसो की कोई जरूरत नही थी माँ को केवल सुरेश की जरूरत थी क्योंकि माँ का एक -2 दिन सुरेश के बिना एक -2 साल के बराबर कट रहा था । उसको इंतजार था तो बस इसका कि उसका सुरेश आयेगा और उसे अपने साथ लेकर जायेगा
लेकिन इस बार जो हुआ उसके बारे में तो माँ ने सोंचा भी नही था ना कोई चिठ्ठी और ना पैसे माँ का दिल घबराने लगा कही कोई अनहोनी तो नही हो गयी लेकिन फिर माँ ने सोंचा हो सकता है सुरेश किसी काम में व्यस्त हो जैसे तैसे मन को तो वहलाना ही था और कोई रास्ता भी तो नही था विचारी माँ के पास
शहर में सुरेश को कामनी नाम की एक लडकी से प्रेम हो गया कामनी बहुत ही सुंदर लडकी थी धीरे –2 इनका प्रेम इतना बढ गया कि बात शादी तक आ गयी कामनी के पिता जी ने भी शादी के लिए हाँ कर दिया और सुरेश कामनी के प्रेम में इतना अन्धा हो चुका था कि उसने कामनी की एक शर्त भी मान ली
कामनी – सुरेश तुम्हे मुझसे शादी करने से पहले मेरी एक शर्त माननी होगी( धमकी वाले अंदाज में)
सुरेश – कैसी शर्त ( आश्चर्य से)
कामनी – तुम कह रहे थे कि गाँव मे तुम्हारी माँ रहती हैं ।
सुरेश – हाँ, तो
कामनी – तो तुम अपनी माँ के साथ रहोगे या मेरे ( आँखे दिखाते हुए)
सुरेश – दोनो के साथ (विनम्रता से कहता है)
कामनी – नही एक मै या वो( तेज आवाज में कहती है)
सुरेश – कामनी वो मेरी माँ है उनका मेरे सिवा इस दुनिया में और कोई नही है।
कामनी – तो ठीक है फिर मैं जा रही हूँ मुझे तुम्हारी कोई जरूरत नही है
सुरेश – please कामनी रूको
कामनी – अब क्या है आज तुमने साबित कर दिया की तुम मुझसे प्यार नही करते हो
सुरेश – नही कामनी ऐसी बात नही है
कामनी – तो फिर कैसी बात है।
सुरेश – कामनी वो मेरी माँ मेरे बिना मर जायेगी
कामनी – हाँ, तो ठीक तो है, मर जाने दो यही तो हम चहाँते है( मुस्काराते हुए कहती है)
सुरेश – वो मुझसे बहुत प्यार करती है ( दु:खी मन से कहता है)
कामनी – मेरी माँ तुमसे कम प्यार करती है और अगर कुछ कमी रह जायेगी तो मेरे पापा पुरी कर देंगे ऊपर से मेरा प्यार सो अलग तुम्हे पता है मेरा प्यार तो दूसरी बात है मेरे मोहल्ले के लडके केवल मेरी एक झलक के लिए मेरे घर के चक्कर लगाते हैं ( अपनी तरफ इशारा करती हुई कहती है)
सुरेश को कामनी के रूप ने वाकई अंधा बना दिया था कुछ सोंच के हाँ, कह देता है
कामनी – ये हुई ना बात और उसे अपने सीने से लगा लेती है और दोनो एक दूसरे से प्रेम करने लगते है
कामनी एक चालू किस्म की लडकी थी अपने माँ-बाप की इकलौती सन्तान थी मौज-मस्ती और ऐयासी ये उसके शौक थे इसलिए वो ऐसे लडके की तलाश में थी जो उसे रोके-टोके ना उसने सुरेश को पुरी तरह से अपने जाल में फाँस लिया था।
कामनी के जालसाजी प्यार ने एक माँ की ममता का गला घोंट दिया था उस माँ के कलेजे के टुकडे को उससे अलग कर दिया और मन ही मन कामनी बहुत खुश हो रही थी अपनी चतुराई पर फूले नही शमा रही थी । सुरेश ने अपनी माँ साधना के एहसानो को भुला दिया था
साधना( की हालत बहुत बुरी हो गयी थी उसकी आँखे रोते -2 सूज गयी थीं ) वह हर रोज अपनी आँखे दरवाजे की तरफ करके भगवान से बस एक ही दुआ मांगती थी कि सुरेश जहाँ भी हो खुश रहे।
इसी तरह से 5 साल बीत गये थे लेकिन सुरेश ने अपनी माँ साधना की कोई खैर खबर तक नही ली उसे एक चिठ्ठी तक नही लिखी थी कामनी ने सुरेश से शादी करने के एक साल बाद एक बच्चे को जन्म दिया उसका नाम कनक था कनक 4 साल का हो गया था कनक अक्सर पार्क में खेलने जाया करता था उसके हम उम्र दोस्त अपने दादा- दादी के साथ आया करते थे अखिर एक दिन उसके दिमांग मे ये सबाल आ ही गया कि मेरे दादा – दादी कहाँ है। मुझसे मिलने नही आये आखिर क्यों?
उसने सोंचा आज मैं अपने पापा से दादा – दादी के बारे में बात करूँगा और वह पार्क से बापस घर आ गया।
शाम हुई सुरेश घर पर आया कनक बेटा कनक कहाँ हो तुम
कनक – हाँ, पापा
सुरेश अपने बेटे कनक से बहुत प्रेम करता था अपने गले से लगा लिया
कनक – पापा मैं आप से बात नही करता आप गंदे हो।
सुरेश – क्यों क्या हुआ मेरा बेटा मुझसे क्यों नाराज है
कनक – आपने मुझे मेरे दादी – दादी से क्यो नही मिलवाया। कहाँ है? मेरे दादा – दादी
सुरेश – बेटा आपके दादा जी तो इस दुनिया को छोड के जा चुके हैं ।
कनक – और दादी जी
सुरेश – (कुछ देर सोंचने के बाद) वो गाँव में रहती है
कनक – तो क्या जब मैं बडा हो जाऊँगा तो आप गाँव में रहोगे
सुरेश ने जैसे ही कनक की ये बात सुनी वो सुन्न पढ गया वो सोंचने लगा और वो वहाँ से चला गया लेकिन कनक की वो बात उसके दिमांग में गूंज रही थी। अब वो अपने किये पर पश्चाताप करने लगा था क्योंकि कनक ने अन्जाने में ही सही पर सुरेश को ये बता दिया था कि जो उसने आपनी माँ के साथ किया था कल वही उसके साथ भी होगा। अब उसको अपनी गलती का एहसास हो चुका था और वह अपनी के माँ पास जाने के लिए तडप रहा था । उसे अपने किए पर गिलानी हो रही थी वह माँ से पैर पकडकर माफी मांगने लिए बेचैन हो उठा था अब पुरा दिन गुजर गया था आज उसका किसी भी काम में मन नही लग रहा था घर में साफ-सफाई भी करनी थी क्योंकि अगले दिन दीपावली का त्वैहार था ।
उधर सुरेश की माँ घर की चौखट पर आस लगाये बैठी थी कि हो सकता है इस दिपावली पर उसका सुरेश आयेगा।
और अगले दिन सुबह माँ.. माँ.. ( शर्माते हुए दबी आवाज में किसी ने वुलाया)
दरबाजा खुला माँ देखते ही अपनी आँखो के आँसू रोक नही पायी दौडकर गले से लगा लिया अब सुरेश भी रो रहा था
माँ – तू कहाँ था सुरेश ( माँ ने रोते हुए सुरेश से पूँछा)
सुरेश – ( लज्जित स्वरो में) माँ मुझे माफ कर दो मुझसे गलती हो गयी और फफक -2 के रोने लगा
माँ – ये कौन है ?
सुरेश – माँ ये आपकी बहु है और कामनी माँ के पैर छूती है
माँ – जीती रहो बहु
माँ – ( अपने आँसू पोंछ के ) सुरेश मेरी तपस्या में क्या कमी रही गयी थी मैंने तुझे बाप की कमी महसूस ना होने दी क्या ये मेरी गलती थी या लोगो की जूठन साफ करके तुझे पढाया ये मेरी गलती थी बेटा मैंने तेरे लिए क्या नही किया और तुने मुझे भुला दिया। तुम जैसी औलाद होगी तो औरत माँ नही बनेगी और आदमी बाप बनने से डरेगा बेटा
सुरेश – माँ मुझे माफ कर दो ( रोते हुए)
माँ – मैं तुमसे नाराज ही कब थी लेकिन जो तुमने मेरे साथ किया कल को वही तुम्हारा बेटा तुम्हारे साथ करेगा तो तुम्हे मेरे दर्द का एहसास होगा
सुरेश – (माँ के पैरो पर गिरकर) माँ मुझे माफ कर दो ।
तभी कनक दादी माँ
सुरेश – माँ ये आपका पोता है
साधना उसको गले से लगाकर प्यार करने लगती है और सुरेश को माफ कर देती है आज सब मिलकर साथ में दिपावली का पर्व मनाते है ।
दोस्तो हमारे पूर्वजों ने एक बहुत ही अच्छी कहावत कही है कि “ नीम का पेड लगाकर आम के फल की उम्मीद कभी मत करना”
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तो दोस्तों ये कहानी आपको कैसी लगी मुझे जरूर बतायें और ये कहानी ज्यादा से ज्यादा अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें क्योंकि हो सकता है कोई आपकी बजह से सुधर जाये ।  
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